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मुंबई2 घंटे पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय

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इन दिनों रणदीप हुड्डा अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को लेकर चर्चा में हैं। वे एक तरफ लिन लैशराम से अपनी शादी तो दूसरी तरफ ‘स्वतंत्र्य वीर सावरकर’ फिल्म को लेकर खबरों में बने हैं। हिंदी और मराठी भाषा में 22 मार्च को सिनेमाघर में रिलीज होने जा रही इस फिल्म से रणदीप पहली बार निर्देशक भी बन गए हैं।

फिल्म में निर्देशन सहित अभिनय, सह-लेखन और निर्माण के साथ-साथ अपनी शादीशुदा लाइफ पर रणदीप से दैनिक भास्कर से खास बातचीत की है। रणदीप हु़ड्डा ने कहा कि लोगों ने शुरुआती समय में उन्हें फिल्म करने के लिए मना किया था। लोगों ने कहा कि पॉलिटिकल पर्सन पर फिल्म करके कॉन्ट्रोवर्सी में फंस जाओगे। ये सब बात सुनकर रणदीप हुड्डा के मन में एक जिज्ञासा जगी और उन्होंने फिल्म करने के लिए हामी भर दी।

स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ का ऑफर आया, तब पहली प्रतिक्रिया क्या थी? पहली चीज यह लगी कि मैं वीर सावरकर जैसा दिखता नहीं हूं। दूसरा, मेरे शुभचिंतक बोल रहे थे कि सावरकर जी पर फिल्म मत करो। तुम एक उम्दा कलाकार हो, तुम सावरकर जी की तरह खामखां एक पॉलिटिकल पर्सन बन जाओगे, कंट्रोवर्सी होगी। इन बातों से मेरी जिज्ञासा और बढ़ी।

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खुद के डायरेक्शन में एक्टिंग करके कैसा फील हुआ?
मुझे काम करते हुए दो दशक से ऊपर हो गया है। अपने करियर के शुरुआत से ही सीन ओके होने के बाद कभी जाकर मॉनिटर नहीं देखता कि कैसा परफॉर्म किया है। अंदर से एक आवाज आ जाती थी। इसमें निर्देशक भी मैं ही था, सो पता था कि क्या चाहिए। कई बार मैं अपना ही शॉर्ट लेना भूल जाता था, क्योंकि दूसरे कामों में बिजी रहता था। एक अभिनेता के तौर पर कम और निर्देशक के तौर पर ज्यादा जुड़ा रहा।

फिल्म स्वातंत्र्य वीर सावरकर के लिए काफी वजन कम किया। इस बारे में विस्तार से बताइए?
मैंने काफी पहले से वजन कम करना शुरू कर दिया था। दरअसल कुछ समय पहले मेरा घुटना टूट गया था। इस वजह से 8 सप्ताह बिस्तर पर पड़ा रहा। बिस्तर पर पड़े-पड़े मेरा वजन बढ़ गया। फिर मैंने दोबारा वजन कम किया, तब उसमें मेरी जान निकल गई।

यह कम वजन इतना समय के लिए चला कि इसमें मेरी बॉडी काफी चोट खा गई। कम से कम दो साल तक मैं अंडरवेट रहा। अंडरवेट मतलब यूजुअली मैं 90 किलो के आसपास होता हूं, लेकिन इस पिक्चर के दौरान मैं 60-65 किलो का था। इतना अंडरवेट रहने से मेरे जॉइंट में दर्द होना शुरू हो गया था। 25-30 किलो कम वजन करके एक-दो महीना निकाल सकते हैं, लेकिन दो साल तक अंडरवेट रहना तकलीफदेह हो गया।

आप दो साल तक 25-30 किलो अंडरवेट रहे। इस दौरान आपकी खाने-पीने की दिनचर्या कैसी होती थी?
हमारे हिंदू धर्म में उपवास और मुसलमानों में रोजा होता है, उसी तरह मैं फास्टिंग करता था। मैं 16-16 घंटे कुछ नहीं खाता था। वजन ज्यादा घटाना था, तब 20 घंटे कुछ नहीं खाता था। जब खाता था, तब केवल नट्स, चिल्ला या अंडा खा लिया। इस तरह 24 घंटे के बीच 3-4 घंटे खाता था। बाकी भूखा रहता था, क्योंकि भूखा रहने से ही इतना वजन घट सकता है और मेंटेन रह सकता है। शुरुआत में दौड़ भी लगाता था।

आमतौर पर 10-12 रैप मारता था, लेकिन उस समय 50 से 100 रैप मारने लगा था। उससे काफी फर्क पड़ा। वॉकिंग भी बहुत करता था। एक पॉइंट के बाद वजन कम होना बंद हो गया। मतलब इतनी हिम्मत ही नहीं रही कि उसे कर पाऊं, सो छोड़ दिया।

आपकी हाल ही में शादी हुई है, कुछ यादें शेयर करिए?
हमने मणिपुर में जाकर शादी की। यह इसलिए किया, क्योंकि हमेशा लड़की के घर जाकर शादी करते हैं। मैं उनकी रीति-रिवाज और परिवार को इज्जत देना चाहता था। हालांकि उस समय मणिपुर के हालात गंभीर थे। वहां पर शादी समारोह में मेरे मम्मी-पापा, भाई-बहन सहित कुछ लोग ही गए थे। शादी के बाद मेरे साले साहब मणिकांत लैशराम बात करते हुए बोले कि इस समय जाट ही आकर यहां शादी कर सकते थे।

आपकी शादी मैतेई रीति-रिवाज से हुई। शादी में कौन-सी रस्में आपको पसंद आईं?
एक तो उनकी वेशभूषा है, जो मेरी पत्नी ने पहनी थी। बहुत सरल तरीके की थी। वहां पर आग नहीं जलाते हैं। तुलसी के पौधे के पास एकदम सीधा बैठना होता है। मुझे बोला गया कि आज अभी के लिए आप भगवान हो। आप हिल नहीं सकते। मेरे साथ एक हेल्पर था। मेरी नाक में खुजली होती थी, तब वह आकर नाक खुजलाता था, क्योंकि मैं हिल नहीं सकता और न ही स्माइल कर सकता था।

मैं डेढ़ घंटा एक ही तरह से बैठा रहा। लिन जब आईं, तब सब उन्हें देख रहे थे, जबकि मैं देख भी नहीं पाया। जब वे मेरे सामने आईं, तब उन्हें देखा। वे सब एक और अच्छा रिवाज करते हैं। वर की मां को मंडप के दूसरी तरफ बैठाते हैं। तुम हिल नहीं रहे हो और तुम्हारे सामने मां बैठी हुई हैं। इसका आशय यह रहा कि जैसी तुम्हारी मां हैं, वैसी तुम्हारी पत्नी हैं। मां जितनी ही इज्जत पत्नी की भी करो। यह रिवाज मुझे बहुत अच्छा लगा।

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पत्नी लिन की वह कौन-सी बात दिल को छू गई, जो उन्हें जीवन साथी बनाने के लिए तैयार हो गए?
देखिए, हमारी मित्रता है। दूसरा वो तो मुझसे भी ज्यादा हिंदू रीति-रिवाजों को फॉलो करती हैं। वे बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं। उनका काम जितनी भी फिल्मों में देखा है, बहुत उम्दा लगा है। हमारी मित्रता काफी सालों से चलती आ रही थी, पर अब जाकर हमने एक पारिवारिक जीवन की तरह रहने का कदम उठाया। काफी लोगों ने बोला कि ऐसा कर लो, वैसा कर लो, लेकिन मैंने कहा कि शादी तो दो परिवारों में होती है।

जब तक हम समाज के लोगों के सामने पूरी रीति-रिवाज से शादी और रिसेप्शन नहीं करेंगे, तब तक वह शादी नहीं हो रही है, वह साथ में रहना ही होगा, इसलिए हमने रीति-रिवाज के साथ शादी की।

आपका कहना है कि डायरेक्टर के हाथ की कठपुतली नहीं हूं। ऐसे में डायरेक्टर के साथ का तालमेल कैसे बिठाते हैं?
सेट पर डायरेक्टर के साथ कभी मेरी ज्यादा बातचीत होती नहीं है। मेरा मानना है कि जितनी बातें करना है, टकराव करना है, वह सब पहले कर लो। फिल्म की शूटिंग शुरू करने के बाद हम दोनों काे पता होता है कि हम क्या कर रहे हैं। उसमें थोड़ा इधर-उधर होता है। अगर हम कहीं पहुंच नहीं पा रहे हैं, तब डायरेक्टर आपकी मदद करता है। लेकिन सेट पर जाने के बाद करना क्या है, इस बारे में बातें नहीं होती हैं।

मैं खुद स्क्रिप्ट को डायरेक्टर से ज्यादा पढ़ लेता हूं, पहले ही प्रैक्टिस कर लेता हूं।

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